॥ हर हर महादेव ॥

॥ शिव तांडव स्तोत्रम् ॥

(रचित: लंकाधिपति रावण द्वारा)

 

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥


जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥


धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥


जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥


सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥


ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिंगभा-
निपीतपंचसायकं निरामयं निरंकुशम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥


अकर्णधारकर्णकर्णमूलमंत्रकर्णिका-
प्रवालपल्लवप्रभाकरोत्कलस्तले।
हिरण्यदण्डनिर्झरी विनिर्गलन्निलिम्प-
निर्झरी निरन्तरं पवित्रमन्वयं हरः॥


निलिम्पनाथनागरी कदम्बमौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्मधुस्रवद्विलोलनी।
तमालनीलकण्ठकण्ठकालिमा प्रभाकरी
मदान्धकारिणी मनो मनोरमा विधेहि मे॥


प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमच्छटा
विडम्बि कण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥


वराकरालभ्रूकटीविलासदग्धलोचनं
शरच्छशांक-शेखरं महेश्वरं महाशिवम्।
महेन्द्रमित्रमन्मथप्रसक्तचित्तमेदुरं
शिवं शिवं शिवं भजे॥ १०


इदं हि नित्यमेव मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम्॥ ११


पूजाऽवसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥ १२


The Shiv Tandav Stotram was composed by the great scholar and devotee Ravana, the king of Lanka, in praise of Lord Shiva's cosmic dance (Tandava). Despite being an adversary in the Ramayana, Ravana was a devout Shiva bhakta. He composed this hymn while trying to lift mount Kailash to take it to Lanka. Pleased by his devotion and this divine composition, Shiva blessed him. This stotram is one of the most musically rich and powerful hymns in Sanskrit literature.

 

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