नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुखहरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहुँ लोक फैली उजियारी॥
शुलधारिणी निराकारा। नित्य शुद्ध तुम विश्वाधारा॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवे। महाबीर जब नाम सुनावे॥
चण्डी दुर्गा रूप निराला। तुम ही जग की रक्षावाला॥
सिंह वाहनी सोहे। जग का पाप तुम्हारा धोए॥
तुम भक्तन की संकट हरती। लखमी सरस्वती रूप धरती॥
पाएँ भक्त तुम्हें जो ध्यावे। सहज शांति मन में पावे॥
आसुरी शक्ति तुम नाशक। भव भव में देव प्रकाशक॥
महिषासुर मद मर्दन। भैरव नाशिनी जग वर्धन॥
नौ रूपों में तुम विख्याती। शैल पुत्री वनिता माती॥
ब्रह्मचारिणि चन्द्रघण्टा। कुष्माण्डा स्कंदमाता ललिता॥
कात्यायनी कालरात्री माँ। महागौरी सिद्धिदात्री माँ॥
नाम तुम्हारे सब शुभ जाने। भक्त भाव से गुण गाने॥
देवि प्रसन्न हो जब भक्त पुकारे। दुख सब हरो जो द्वार पे आए॥
नवद्वार शरीर में वास। दसम द्वार देती उजास॥
धन धान्य और सुख साधन। दे माँ भक्तन को वरदान॥
सब तीर्थ तुम्हें में समाए। पाप ताप दीनों हटाए॥
जग करे तुम्हारी महिमा गान। देश देश में तुम्हारा निदान॥
विन्ध्याचल गिरि में वास तुम्हारा। देती भक्तन को पार उतारा॥
जो भक्त दुर्गा चालीसा ध्यावे। अष्ट सिद्धि नव निधि वो पावे॥
पढ़े सुने जो इस चालीसा। पाए माँ का वर और आशीसा॥
नमो नमो जय जय जगदम्बे। दासन के प्रभु सब दुख हरिया।
जो यह चालीसा पढ़े सुने। ता पर कृपा करें माता तुरते॥
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